शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ मोह, गरुड़जी का काकभुशुण्डि से रामकथा और राम महिमा सुनना

शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से गरुड़जी के मोह का कारण प्रकट होता है। फिर गरुड़जी काकभुशुण्डि से श्रीरामकथा और प्रभु की अनंत महिमा का अमृतमय श्रवण करते हैं।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १२ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥ राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥ १ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजी के चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते।

चौपाई

राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥ जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥ २ ॥

अर्थ:

भगवान् श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जल की बूँदें और पृथ्वी के रज-कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजी के चरित्र का वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥ उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥ ३ ॥

अर्थ:

यह पवित्र कथा भगवान् के परमपद को देनेवाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को सुनायी थी।

चौपाई

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥ सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

मैंने श्रीरामजी के कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। हे भवानी! अब और क्या कहूँ? सुन्दर कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं--

चौपाई

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥ ५ ॥

अर्थ:

हे त्रिपुरारि! मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्यु के भय को हरण करनेवाले श्रीरामजी के गुण (चरित्र) सुने।

दोहा

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह। जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह॥ ५२ (क) ॥

अर्थ:

हे कृपाधाम! अब आपकी कृपा से मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु! मैं सच्चिदानन्दघन प्रभु श्रीरामजी के प्रताप को जान गयी।

दोहा

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ (ख) ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीर की कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटों से उसे पीकर तृप्त नहीं होता।

दोहा 53 के अंतर्गत
चौपाई

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥ जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान् के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं।

चौपाई

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥ बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥ २ ॥

अर्थ:

जो संसाररूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है। श्रीहरि के गुणसमूह तो विषयी लोगों के लिये भी कानों को सुख देनेवाले और मन को आनन्द देनेवाले हैं।

चौपाई

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥ ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥ ३ ॥

अर्थ:

जगत् में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे जड़ जीव अपनी आत्मा की हत्या करनेवाले हैं।

चौपाई

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥ तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपने श्रीरामचरितमानस का गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। आपने जो यह कहा कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कही थी--

दोहा

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह। बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥ ५३ ॥

अर्थ:

सो कौए का शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ़ हैं, उनका श्रीरामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है और उन्हें श्रीरघुनाथजी की भक्ति भी प्राप्त है, इस बात का मुझे परम सन्देह हो रहा है।

दोहा 54 के अंतर्गत
चौपाई

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥ धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥ १ ॥

अर्थ:

हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्यों में कोई एक धर्म के व्रत का धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओं में कोई एक विषय से विमुख (विषयों का त्यागी) और वैराग्यपरायण होता है।

चौपाई

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥ ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥ २ ॥

अर्थ:

श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक् ज्ञान को प्राप्त करता है। और करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है। जगत् में कोई विरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा।

चौपाई

तिन्ह सहस्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्म लीन बिग्यानी॥ धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥ ३ ॥

अर्थ:

हजारों जीवन्मुक्तों में भी सब सुखों की खान, ब्रह्म में लीन विज्ञानवान् पुरुष और भी दुर्लभ है। धर्मात्मा, वैराग्यवान्, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मपरायण प्राणी—

चौपाई

सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥ सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥ ४ ॥

अर्थ:

इन सबमें भी हे देवाधिदेव महादेवजी! वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है जो मद और मायासे रहित होकर श्रीरामजी की भक्तिके परायण हो। हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्तिको कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये।

दोहा

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर। नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर॥ ५४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! कहिये, [ऐसे] श्रीरामपरायण, ज्ञाननिरत, गुणागार और धीरबुद्धि भुशुण्डिजी ने कौए का शरीर किस कारण पाया ?

दोहा 55 के अंतर्गत
चौपाई

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे कृपालु! बताइये, उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया? और हे कामदेव के शत्रु! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है।

चौपाई

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी॥ तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥ २ ॥

अर्थ:

गरुड़जी तो महान् ज्ञानी, सद्गुणों की राशि, श्री हरि के सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहने वाले (उनके वाहन ही) हैं। उन्होंने मुनियों के समूह को छोड़कर, कौए से जाकर हरिकथा किस कारण सुनी?

चौपाई

कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा॥ गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

कहिये, काकभुशुण्डि और गरुड़ इन दोनों हरिभक्तों की बातचीत किस प्रकार हुई? पार्वतीजी की सरल, सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी सुख पाकर आदर के साथ बोले--।

चौपाई

धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी॥ सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे सती! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है। श्रीरघुनाथजी के चरणों में तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अत्यधिक प्रेम है)। अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुनने से सारे लोक के भ्रम का नाश हो जाता है।

चौपाई

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥ ५ ॥

अर्थ:

तथा श्रीरामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाता है।

दोहा

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ। सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ॥ ५५ ॥

अर्थ:

पक्षिराज गरुड़जी ने भी जाकर काकभुशुण्डिजी से प्रायः ऐसे ही प्रश्न किये थे। हे उमा! मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो।

दोहा 56 के अंतर्गत
चौपाई

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥ प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥ १ ॥

अर्थ:

मैंने जिस प्रकार वह भव (जन्म-मृत्यु) से छुड़ाने वाली कथा सुनी, हे सुमुखि! हे सुलोचनि! वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर हुआ था। तब तुम्हारा नाम सती था।

चौपाई

दच्छ जग्य तव भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना॥ मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा॥ २ ॥

अर्थ:

दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुमने अत्यन्त क्रोध करके प्राण त्याग दिये थे; और फिर मेरे अनुचरों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया था। वह सारा प्रसंग तुम जानती ही हो।

चौपाई

तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें॥ सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ और हे प्रिये! मैं तुम्हारे वियोग से दुखी हो गया। मैं विरक्तभाव से सुन्दर वन, पर्वत, नदी और तालाबों का कौतुक (दृश्य) देखता फिरता था।

चौपाई

गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी॥ तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए॥ ४ ॥

अर्थ:

सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में, और भी दूर, एक बहुत ही सुन्दर नील पर्वत है। उसके सुन्दर स्वर्णमय शिखर हैं; उनमें से चार सुन्दर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे।

चौपाई

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला॥ सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा॥ ५ ॥

अर्थ:

उन शिखरों पर एक-एक विशाल वृक्ष है—बरगद, पीपल, पाकर और आम। पर्वत के ऊपर एक सुन्दर तालाब शोभित है; मणियों की सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।

दोहा

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग। कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग॥ ५६ ॥

अर्थ:

उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है; उसमें रंग-बिरंगे बहुत-से कमल खिले हुए हैं; हंसगण मधुर स्वर से बोल रहे हैं और भौरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं।

दोहा 57 के अंतर्गत
चौपाई

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥ माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥ १ ॥

अर्थ:

उस सुन्दर पर्वत पर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक,

चौपाई

रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥ तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥ २ ॥

अर्थ:

जो सारे जगत् में छा रहे हैं, उस पर्वत के पास भी कभी नहीं फटकते। वहाँ बसकर जिस प्रकार वह काक हरि को भजता है, हे उमा! उसे प्रेमसहित सुनो।

चौपाई

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥ आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान धरता है। पाकर के नीचे जपयज्ञ करता है। आम की छाया में मानसिक पूजा करता है। श्रीहरि के भजन को छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है।

चौपाई

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥ राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥ ४ ॥

अर्थ:

बरगद के नीचे वह श्रीहरि की कथाओं के प्रसंग कहता है। वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं। वह विचित्र रामचरित्र को अनेकों प्रकार से प्रेमसहित आदरपूर्वक गान करता है।

चौपाई

सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥ जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥ ५ ॥

अर्थ:

सब निर्मल बुद्धिवाले हंस, जो सदा उस तालाब पर बसते हैं, उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक देखा, तब मेरे हृदय में विशेष आनन्द उत्पन्न हुआ।

दोहा

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥ ५७ ॥

अर्थ:

तब मैंने हंस का शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्रीरघुनाथजी के गुणों को आदरसहित सुनकर फिर कैलास को लौट आया।

दोहा 58 के अंतर्गत
चौपाई

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥ अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥ १ ॥

अर्थ:

हे गिरिजे! मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डि के पास गया था। अब वह कथा सुनो जिस कारण से पक्षिकुल के ध्वजा गरुड़जी उस काक के पास गये थे।

चौपाई

जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥ इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥ २ ॥

अर्थ:

जब श्रीरघुनाथजी ने ऐसी रणलीला की, जिस लीलाका स्मरण करने से मुझे लज्जा होती है—मेघनाद के हाथों अपने को बाँधा लिया—तब नारद मुनि ने गरुड़ को भेजा।

चौपाई

बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥ प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥ ३ ॥

अर्थ:

सर्पों के भक्षक गरुड़जी बन्धन काटकर गये, तब उनके हृदय में बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। प्रभु के बन्धन को स्मरण करके सर्पों के शत्रु गरुड़जी बहुत प्रकार से विचार करने लगे--।

चौपाई

ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥ सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

जो व्यापक, विकाररहित, वाणी के पति और माया-मोह से परे ब्रह्म परमेश्वर हैं, मैंने सुना था कि जगत् में उन्हीं का अवतार है। पर मैंने उस (अवतार) का प्रभाव कुछ भी नहीं देखा।

दोहा

भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम। खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥ ५८ ॥

अर्थ:

जिनका नाम जपकर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाते हैं, उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया।

दोहा 59 के अंतर्गत
चौपाई

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥ खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥ १ ॥

अर्थ:

गरुड़जी ने अनेकों प्रकार से अपने मन को समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदय में भ्रम और भी अधिक छा गया। [सन्देहजनित] दुःख से दुखी होकर, मन में कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये।

चौपाई

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥ सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥ २ ॥

अर्थ:

व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजी के पास गये और मन में जो सन्देह था, वह उनसे कहा। उसे सुनकर नारद को अत्यन्त दया आयी। [उन्होंने कहा--] हे गरुड़! सुनिये, श्रीरामजी की माया बड़ी ही बलवती है।

चौपाई

जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआईं बिमोह मन करई॥ जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥ ३ ॥

अर्थ:

जो ज्ञानियों के चित्त को भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मन में जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझ को भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है।

चौपाई

महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥ चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गरुड़! आपके हृदय में बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझाने से तुरंत नहीं मिटेगा। अतः हे पक्षिराज! आप ब्रह्माजी के पास जाइये और वहाँ जिस काम के लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा।

दोहा

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान। हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान॥ ५९ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजी का गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरि की माया का बल वर्णन करते हुए चले।

दोहा 60 के अंतर्गत
चौपाई

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥ सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥ १ ॥

अर्थ:

तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजी के पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाया और उनके प्रताप को समझकर उनके प्रति अत्यन्त प्रेम छा गया।

चौपाई

मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥ हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥ २ ॥

अर्थ:

ब्रह्माजी मन में विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान् की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझ तक को अनेकों बार नचाया है।

चौपाई

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥ तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥ ३ ॥

अर्थ:

यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य [की बात] नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले-- श्रीरामजी की महिमा को महादेवजी जानते हैं।

चौपाई

बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥ तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गरुड़! तुम शंकरजी के पास जाओ। हे तात! और कहीं किसी से न पूछना। तुम्हारे सन्देह का नाश वहीं होगा। ब्रह्माजी का वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये।

दोहा

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास। जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास॥ ६० ॥

अर्थ:

तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये। हे उमा! उस समय मैं कुबेर के घर जा रहा था और तुम कैलास पर थीं।

दोहा 61 के अंतर्गत
चौपाई

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥ सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥ १ ॥

अर्थ:

गरुड़ ने आदरपूर्वक मेरे चरणों में सिर नवाया और फिर मुझ को अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेम सहित उनसे कहा--।

चौपाई

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥ तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥ २ ॥

अर्थ:

हे गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब सन्देहों का तो तभी नाश हो जब दीर्घ काल तक सत्संग किया जाय।

चौपाई

सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥ जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥ ३ ॥

अर्थ:

और वहाँ (सत्संग में) सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियों ने अनेकों प्रकार से गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्त में भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं।

चौपाई

नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई॥ जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम होगा।

दोहा

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥ ६१ ॥

अर्थ:

सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गये बिना श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता।

दोहा 62 के अंतर्गत
चौपाई

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥ उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥ १ ॥

अर्थ:

बिना प्रेम के केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्य आदि के करने से श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते। [अतएव तुम सत्संग के लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशा में एक सुन्दर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं।

चौपाई

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥ राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥ २ ॥

अर्थ:

वे राम भक्ति के मार्ग में परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों के धाम हैं और बहुत काल के हैं। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजी की कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँति के श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं।

चौपाई

जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥ मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥ ३ ॥

अर्थ:

वहाँ जाकर श्रीहरि के गुणसमूहों को सुनो। उनके सुनने से मोह से उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणों में सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया।

चौपाई

ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥ होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खोवै चह कृपानिधाना॥ ४ ॥

अर्थ:

हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजी की कृपा से उसका मर्म (भेद) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं।

चौपाई

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥ प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥ ५ ॥

अर्थ:

फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षी की ही बोली समझते हैं। हे भवानी ! प्रभु की माया [बड़ी ही] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले ?

दोहा

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान। ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान॥ ६२ (क) ॥

अर्थ:

जो ज्ञानियों में और भक्तों में शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान् के वाहन हैं, उन गरुड़ को भी मायाने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं।

दोहा

सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन। अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान॥ ६२ (ख) ॥

अर्थ:

यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजी को भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है? जी में ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस माया के स्वामी भगवान् का भजन करते हैं।

दोहा 63 के अंतर्गत
चौपाई

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥ देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥ १ ॥

अर्थ:

गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शन से ही] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा।

चौपाई

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥ बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए॥ २ ॥

अर्थ:

तालाब में स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्त से वटवृक्ष के नीचे गये। वहाँ श्रीरामजी के सुन्दर चरित्र सुनने के लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे।

चौपाई

कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥ आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥ ३ ॥

अर्थ:

भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियों के राजा गरुड़जी को आते देखकर काकभुशुण्डिजी सहित सारा पक्षि समाज हर्षित हुआ।

चौपाई

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥ करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने पक्षिराज गरुड़जी का बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत पूछकर बैठने के लिये सुन्दर आसन दिया। फिर प्रेम सहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले--।

दोहा

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज। आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज॥ ६३ (क) ॥

अर्थ:

हे नाथ! हे पक्षिराज! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें, मैं अब वही करूँ। हे प्रभो! आप किस कार्य के लिये आये हैं?

दोहा

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥ ६३ (ख) ॥

अर्थ:

पक्षिराज गरुड़जी ने कोमल वचन कहे--आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी स्तुति स्वयं महादेवजी ने आदरपूर्वक अपने श्रीमुख से की है।

दोहा 64 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥ देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! सुनिये, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गये। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, सन्देह और अनेक प्रकार के भ्रम सब जाते रहे।

चौपाई

अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥ सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥ २ ॥

अर्थ:

अब हे तात! आप मुझे श्रीरामजी की अत्यन्त पवित्र करनेवाली, सदा सुख देनेवाली और दुःखसमूह का नाश करनेवाली कथा आदरसहित सुनाइये। हे प्रभो! मैं बार-बार आपसे यही विनती करता हूँ।

चौपाई

सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता॥ भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

गरुड़जी की विनम्र, सरल, सुन्दर प्रेमयुक्त, सुखप्रद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डिजी के मन में परम उत्साह हुआ और वे श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे।

चौपाई

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥ पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥ ४ ॥

अर्थ:

है भवानी! पहले तो उन्होंने बड़े ही प्रेम से रामचरितमानस सरोवर का रूपक समझाकर कहा। फिर नारदजी का अपार मोह और फिर रावण का अवतार कहा।

चौपाई

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई॥ ५ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु के अवतार की कथा वर्णन की। तदनन्तर मन लगाकर श्रीरामजी की बाललीलाएँ कहीं।

दोहा

बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह। रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह॥ ६४ ॥

अर्थ:

मन में परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकार की बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि आगमन और श्रीरघुबीरजी का विवाह वर्णन किया।

दोहा 65 के अंतर्गत
चौपाई

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥ पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥ १ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामजी के राज्याभिषेक का प्रसंग, फिर राजा दशरथजी के वचन से राजरस (राज्याभिषेक के आनन्द) में भंग पड़ना, फिर नगरवासियों का विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मण का संवाद कहा।

चौपाई

बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥ बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीराम का वनगमन, केवट का प्रेम, गंगाजी से पार उतरकर प्रयाग में निवास, वाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजी का मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूट में बसे, वह सब कहा।

चौपाई

सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥ करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर मन्त्री सुमन्त्रजी का नगर में लौटना, राजा दशरथजी का मरण, भरतजी का [ननिहाल से] अयोध्यामें आना और उनके प्रेम का बहुत वर्णन किया। राजा की अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियों को साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुख की राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे।

चौपाई

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥ भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरघुनाथजी ने उनको बहुत प्रकार से समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजी की नन्दिग्राम में रहने की रीति, इन्द्रपुत्र जयन्त की नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजी का मिलाप वर्णन किया।

दोहा

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥ ६५ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार विराध का वध हुआ और देह त्यागी सरभंगजी का प्रसंग कहकर, फिर सुतीछनजी की प्रीति वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजी का सत्संग-वृत्तान्त कहा।

दोहा 66 के अंतर्गत
चौपाई

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥ पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥ १ ॥

अर्थ:

दण्डकवन का पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजी ने गृध्रराज के साथ मित्रता का वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभु ने पञ्चवटी में निवास किया और सब मुनियों के भय का नाश किया।

चौपाई

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥ खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥ २ ॥

अर्थ:

और फिर जैसे लक्ष्मणजी को अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखा को कुरूप किया, वह सब वर्णन किया। फिर खर-दूषण-वध और जिस प्रकार रावण ने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा।

चौपाई

दसकंधर मारीच बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥ पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥ ३ ॥

अर्थ:

तथा जिस प्रकार रावण और मारीच की बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही। फिर माया सीता का हरण और श्रीरघुबीर के विरह का कुछ वर्णन किया।

चौपाई

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥ बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु ने गिद्ध जटायु की जिस प्रकार क्रिया की, कबन्ध का वध करके शबरी को परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी सरोवर के तीर पर गये, वह सब कहा।

दोहा

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग। पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग॥ ६६ (क) ॥

अर्थ:

प्रभु और नारदजी का संवाद और मारुतिके मिलने का प्रसंग कहकर फिर सुग्रीव से मित्रता और बाली के प्राणनाश का वर्णन किया।

दोहा

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास। बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास॥ ६६ (ख) ॥

अर्थ:

कपि को तिलक करके प्रभु ने प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया, वह तथा वर्षा और शरद् का वर्णन, श्रीरामजी का सुग्रीव पर रोष और सुग्रीव का भय आदि प्रसंग कहे।

दोहा 67 के अंतर्गत
चौपाई

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए॥ बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती॥ १ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार वानरराज सुग्रीव ने वानरों को भेजा और वे सीताजी की खोज में जिस प्रकार सब दिशाओं में गये, जिस प्रकार उन्होंने बिल में प्रवेश किया और फिर जैसे वानरों को सम्पाती मिला, वह कथा कही।

चौपाई

सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा॥ लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

संपाती से सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमानजी जिस तरह अपार समुद्र को लाँघ गये, फिर हनुमानजी ने जैसे लंका में प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजी को धीरज दिया, सो सब कहा।

चौपाई

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी॥ आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही की कुसल सुनाई॥ ३ ॥

अर्थ:

अशोकवन को उजाड़कर, रावण को समझाकर, लंका पुरी को जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्र को लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजी की कुशल सुनायी।

चौपाई

सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा॥ मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर जिस प्रकार सेना सहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्र के तट पर उतरे और जिस प्रकार विभीषणजी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्र के बाँधने की कथा उसने सुनायी।

दोहा

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार। गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार॥ ६७ (क) ॥

अर्थ:

पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरों की सेना समुद्र के पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा।

दोहा

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार। कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार॥ ६७ (ख) ॥

अर्थ:

फिर राक्षसों और वानरों के युद्ध का अनेकों प्रकार से वर्णन किया। फिर कुम्भकर्ण और मेघनाद के बल, पुरुषार्थ और संहार की कथा कही।

दोहा 68 के अंतर्गत
चौपाई

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना॥ रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका॥ १ ॥

अर्थ:

नाना प्रकार के राक्षस-समूहों के मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावण के अनेक प्रकार के युद्ध का वर्णन किया। रावणवध, मन्दोदरी का शोक, विभीषण का राज्याभिषेक और देवताओं का शोकरहित होना कहकर।

चौपाई

सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी॥ पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥ २ ॥

अर्थ:

फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजी का मिलाप कहा। जिस प्रकार देवताओं ने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरों समेत पुष्पक विमान पर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरी को चले, वह कहा।

चौपाई

जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥ कहेसि बहोरि राम अभिषेका। पुर बरनत नृपनीति अनेका॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर (अयोध्या) में आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजी ने विस्तारपूर्वक वर्णन किये। फिर उन्होंने श्रीरामजी का राज्याभिषेक कहा। [शिवजी कहते हैं--] अयोध्यापुरी का और अनेक प्रकार की नीतियों का वर्णन करते हुए--।

चौपाई

कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥ सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥ ४ ॥

अर्थ:

भुशुण्डिजी ने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मन में बहुत उत्साहित (आनन्दित) होकर वचन कहने लगे--।

सोरठा

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक॥ ६८ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रह से श्रीरामजी के चरणों में मेरा प्रेम हो गया।

सोरठा

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि। चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन॥ ६८ (ख) ॥

अर्थ:

युद्ध में प्रभु का नागपाश से बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्दघन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं।

दोहा 69 के अंतर्गत
चौपाई

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥ सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥ १ ॥

अर्थ:

बिलकुल ही लौकिक मनुष्यों जैसा चरित्र देखकर मेरे हृदय में भारी सन्देह हो गया। अब मैं उस भ्रम को अपने लिए हितकर मानता हूँ। कृपानिधान ने मुझ पर यह बड़ा अनुग्रह किया।

चौपाई

जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥ जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥ २ ॥

अर्थ:

जो धूप से अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्ष की छाया का सुख जानता है। हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता ?

चौपाई

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥ निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥ ३ ॥

अर्थ:

और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकार से गायी है ? वेद, शास्त्र और पुराणों का यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि--।

चौपाई

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥ राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

शुद्ध (सच्चे) संत उसी को मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजी की कृपा से मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपा से मेरा सन्देह चला गया।

दोहा

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग। पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग॥ ६९ (क) ॥

अर्थ:

पक्षिराज गरुड़जी की विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी का शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रों में जल भर आया और वे मन में अत्यन्त हर्षित हुए।

दोहा

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास। पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥ ६९ (ख) ॥

अर्थ:

हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथा के रसिक और हरि के दास श्रोता को पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करने योग्य) रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं।

दोहा 70 के अंतर्गत
चौपाई

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥ सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥ १ ॥

अर्थ:

काकभुशुण्डिजी ने फिर कहा-पक्षिराज पर उनका प्रेम कम न था (अर्थात् बहुत था)-हे नाथ! आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजी के कृपापात्र हैं।

चौपाई

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया॥ पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥ २ ॥

अर्थ:

आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझ पर दया की है। हे पक्षिराज! मोह के बहाने श्रीरघुनाथजी ने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है।

चौपाई

तुम्ह निज मोह कही खगसाईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥ नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे पक्षियों के स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाईं! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्व के मर्मज्ञ और उसका उपदेश करने वाले श्रेष्ठ मुनि हैं।

चौपाई

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥ तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥ ४ ॥

अर्थ:

उनमें से भी किस-किसको मोह ने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया ? जगत् में ऐसा कौन है जिसे काम ने न नचाया हो ? तृष्णा ने किसको मतवाला नहीं बनाया ? क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया ?

दोहा

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार॥ ७० (क) ॥

अर्थ:

इस संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणों का धाम है, जिसकी लोभ ने विडम्बना (मिट्टी पलीद) न की हो।

दोहा

श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि॥ ७० (ख) ॥

अर्थ:

लक्ष्मी के मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर दिया ? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र-बाण न लगे हों ?

दोहा 71 के अंतर्गत
चौपाई

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥ जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥ १ ॥

अर्थ:

[रज, तम आदि] गुणों का किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मद ने अछूता छोड़ा हो। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया? ममता ने किस के यश का नाश नहीं किया?

चौपाई

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥ चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥ २ ॥

अर्थ:

मत्सर (डाह) ने किस को कलंक नहीं लगाया? शोक-रूपी पवन ने किसे नहीं डोलाया? चिन्ता-रूपी साँपिन ने किस को नहीं खाया? जगत में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो?

चौपाई

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥ सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी॥ ३ ॥

अर्थ:

मनोरथ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है। ऐसा धैर्यवान कौन है, जिसके शरीर में यह कीड़ा न लगा हो? पुत्र की, धन की और लोक-ईषणा की इन तीन प्रबल इच्छाओं ने किस की बुद्धि को मलिन नहीं कर दिया (बिगाड़ नहीं दिया)?

चौपाई

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा॥ सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

यह सब माया का परिवारा प्रबल, अमित है। इसका वर्णन कौन कर सकता है? शिवजी और चतुरानन जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव किस लेखे में हैं?

दोहा

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड। सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड॥ ७१ (क) ॥

अर्थ:

माया की प्रचण्ड सेना संसार में व्याप्त रही। सेनापति काम आदि भट दम्भ, कपट और पाषण्ड हैं।

दोहा

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि॥ ७१ (ख) ॥

अर्थ:

वह माया श्रीरघुवीर की दासी है। यद्यपि समझने पर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजी की कृपा के बिना छूटती नहीं। हे नाथ! यह मैं पैर जमा कर कहता हूँ।

दोहा 72 के अंतर्गत
चौपाई

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥ १ ॥

अर्थ:

जो माया सारे जगत् को नचाती है और जिसका चरित किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की भ्रुकुटी के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है।

चौपाई

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अज, विज्ञान रूप, बल के धाम, व्यापक एवं व्याप्य, अखण्ड, अनन्त, अखिल, अमोघशक्ति और भगवान् हैं।

चौपाई

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥ निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे निर्गुण, महान, वाणी और इन्द्रियों से परे, सब कुछ देखने वाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार, मोहरहित, नित्य, निरंजन, सुख की राशि हैं।

चौपाई

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रकृति से परे, प्रभु सबके हृदय में बसने वाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ मोह का कारण ही नहीं है। क्या अन्धकार कभी सूर्य के सामने जा सकता है?

दोहा

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥ ७२ (क) ॥

अर्थ:

भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने भक्तों के लिये राजा का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों के-से अनेकों परम पावन चरित्र किये।

दोहा

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥ ७२ (ख) ॥

अर्थ:

जैसे कोई नट अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसी के अनुकूल) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमें से कोई हो नहीं जाता।

दोहा 73 के अंतर्गत
चौपाई

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥ जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥ १ ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयों के वश और कामी हैं, वे ही प्रभु पर इस प्रकार मोह का आरोप करते हैं।

चौपाई

नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥ जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥ २ ॥

अर्थ:

जब जिसे नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमा को पीले रंग का कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उदय हुआ है।

चौपाई

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोहबस आपुहि लेखा॥ बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥ ३ ॥

अर्थ:

नौका पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत् को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपने को अचल समझता है। बालक घूमते हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपस में एक दूसरे को झूठा कहते हैं।

चौपाई

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥ मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! श्रीहरि के विषयक इस मोह की कल्पना भी ऐसी ही है। भगवान् में तो स्वप्न में भी अज्ञान का प्रसंग नहीं है। किन्तु जो मायावश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदय पर अनेकों प्रकार के परदे पड़े हैं।

चौपाई

ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

वे मूर्ख हठ के वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजी पर आरोपित करते हैं।

दोहा

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥ ७३ (क) ॥

अर्थ:

जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःखरूप घर में आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकार-रूपी कुएँ में पड़े हुए हैं।

दोहा

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख) ॥

अर्थ:

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ है, परन्तु सगुण रूप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान् के अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रों को सुनकर मुनियों के भी मन को भ्रम हो जाता है।

दोहा 74 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई॥ जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥ १ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरघुनाथजी की प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।

चौपाई

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥ ताते नहिं कछु तुम्हहि दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥ २ ॥

अर्थ:

हे तात! आप श्रीरामजी के कृपापात्र हैं। श्रीहरि के गुणों में आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देने वाले हैं। इसी से मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्य की बातें आपको गाकर सुनाता हूँ।

चौपाई

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का सहज स्वभाव सुनिये। वे जन में अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसार का मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त शोकों का देने वाला है।

चौपाई

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥ जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

इसीलिए कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवक पर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाईं! जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदय की भाँति चिरा डालती है।

दोहा

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर। ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥ ७४ (क) ॥

अर्थ:

यद्यपि बच्चा पहले दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोग के नाश के लिये माता बच्चे की उस पीड़ा को कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़े को चिरवा ही डालती है)।

दोहा

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि। तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ ७४ (ख) ॥

अर्थ:

उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दास का अभिमान उसके हित के लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते।

दोहा 75 के अंतर्गत
चौपाई

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥ जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥ १ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजी की कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य-शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं।

चौपाई

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥ जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥ २ ॥

अर्थ:

तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [भगवान् की शिशुलीला में] लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ।

चौपाई

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥ निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥ ३ ॥

अर्थ:

बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ।

चौपाई

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहु रंगा॥ ४ ॥

अर्थ:

छोटे-से कौए का शरीर धरकर और भगवान् के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति-भाँति के बालचरित्रों को देखा करता हूँ।

दोहा

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ। जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ॥ ७५ (क) ॥

अर्थ:

लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगन में उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ।

दोहा

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर। सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥ ७५ (ख) ॥

अर्थ:

एक बार श्रीरघुवीर ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये। प्रभु की उस लीला का स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजी का शरीर [प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया।

दोहा 76 के अंतर्गत
चौपाई

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक॥ नृप मंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती॥ १ ॥

अर्थ:

भुशुण्डिजी कहने लगे--हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजी का चरित्र सेवकों को सुख देनेवाला है। [अयोध्या का] राजमहल सब प्रकार से सुन्दर है। सोने के महल में नाना प्रकार के रत्न जड़े हुए हैं।

चौपाई

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥ बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर आँगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगन में विचर रहे हैं।

चौपाई

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥ नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥ ३ ॥

अर्थ:

मरकत मणि के समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अंग- अंग में बहुत-से कामदेवों की शोभा है। नवीन [लाल] कमल के समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुन्दर अंगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योति से चन्द्रमा की कान्ति को हरनेवाले हैं।

चौपाई

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥ चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई॥ ४ ॥

अर्थ:

[तलवे में] वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणों में मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नों से जड़ी हुई सोने की बनी हुई सुन्दर करधनी का शब्द सुहावना लग रहा है।

दोहा

रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर। उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर॥ ७६ ॥

अर्थ:

उदर पर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थल पर अनेकों प्रकार के बालविभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं।

दोहा 77 के अंतर्गत
चौपाई

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥ कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा॥ १ ॥

अर्थ:

लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मन को हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओं पर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह के-से कंधे और शंख के समान (तीन रेखाओं से युक्त) ग्रीवा है। सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छवि की सीमा ही है।

चौपाई

कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥ ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥ २ ॥

अर्थ:

कलबल (तोतले) वचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी दो-दो दाँतियाँ हैं। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखों को देनेवाली चन्द्रमा की किरणों के समान मधुर मुसकान है।

चौपाई

नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥ ३ ॥

अर्थ:

नीले कमल के समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक सुशोभित है। भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशों की छवि छा रही है।

चौपाई

पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥ रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥ ४ ॥

अर्थ:

पीली और महीन झँगुली शरीर पर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजी के आँगन में विहार करनेवाले रूप की राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाईं देखकर नाचते हैं।

चौपाई

मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥ किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥ ५ ॥

अर्थ:

और मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जा आती है! किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे।

दोहा

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं। जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं॥ ७७ (क) ॥

अर्थ:

मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं और भाग जाने पर रोते हैं, और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने के लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं।

दोहा

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह। कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥ ७७ (ख) ॥

अर्थ:

साधारण बच्चों-जैसी लीला देखकर मुझे मोह हुआ। सच्चिदानन्दघन प्रभु यह कौन-सा चरित्र कर रहे हैं।

दोहा 78 के अंतर्गत
चौपाई

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! मन में इतना लाते ही श्रीरघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझ पर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवों की भाँति संसार में डालनेवाली हुई।

चौपाई

नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥ ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान् के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड़-चेतन सभी जीव माया के वश हैं।

चौपाई

जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥ माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुन खानी॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि जीवों को एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीव में भेद ही कैसा ? अभिमानी जीव माया के वश है और वह [सत्त्व, रज, तम—इन] तीनों गुणों की खान माया ईश्वर के वश में है।

चौपाई

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥ मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥ ४ ॥

अर्थ:

जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि माया का किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन बिना करोड़ों उपाय करने पर भी नहीं जा सकता।

दोहा

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान॥ ७८ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होने पर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है।

दोहा

राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ॥ सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ (ख) ॥

अर्थ:

सभी तारागणों के साथ सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं, उन सब में दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती।

दोहा 79 के अंतर्गत
चौपाई

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥ हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥ १ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्रीहरि के भजन बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता। श्रीहरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती। प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है।

चौपाई

ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर॥ भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥ २ ॥

अर्थ:

हे पक्षिश्रेष्ठ! इसीसे दास का नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। श्रीरामजी ने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये।

चौपाई

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥ जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥ ३ ॥

अर्थ:

उस खेल का मर्म किसी ने नहीं जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता-पिता ने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतल वाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े।

चौपाई

तब मैं भागि चलेउँ उरगारी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥ जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! तब मैं भाग चला। श्रीरामजी ने मुझे पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरि की भुजा को अपने पास देखता था।

दोहा

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात। जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात॥ ७९ (क) ॥

अर्थ:

मैं ब्रह्मलोक तक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछे की ओर देखा, तो हे तात! श्रीरामजी की भुजा में और मुझमें केवल दो ही अंगुल का बीच था।

दोहा

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि। गयउँतहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि॥ ७९ (ख) ॥

अर्थ:

सातों आवरणों को भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी, वहाँ तक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभु की भुजा को [अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया।

दोहा 80 के अंतर्गत
चौपाई

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥ मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूँद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही कोसलपुर में पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुख में चला गया।

चौपाई

उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥ अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥ २ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेट में बहुत-से ब्रह्माण्डों के समूह देखे। वहाँ (उन ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक से एक की बढ़कर थी।

चौपाई

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥ अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥ ३ ॥

अर्थ:

करोड़ों ब्रह्मा और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि।

चौपाई

सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥ ४ ॥

अर्थ:

असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे।

दोहा

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ। सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ॥ ८० (क) ॥

अर्थ:

जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय!

दोहा

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक। एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक॥ ८० (ख) ॥

अर्थ:

मैं एक-एक ब्रह्माण्ड में एक-एक सौ वर्ष तक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा।

दोहा 81 के अंतर्गत
चौपाई

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥ १ ॥

अर्थ:

प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, निशाचर, पशु, पक्षी, सर्प।

चौपाई

देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती॥ महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना॥ २ ॥

अर्थ:

तथा नाना जाति के देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकार की थी।

चौपाई

अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥ अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रत्येक ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकार के ही नर-नारी थे।

चौपाई

दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता॥ प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपों के थे। मैं प्रत्येक ब्रह्माण्ड में रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता।

दोहा

भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क) ॥

अर्थ:

हे हरिजन! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डों में फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को मैंने दूसरी तरह का नहीं देखा।

दोहा

सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥ ८१ (ख) ॥

अर्थ:

सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुबीर! इस प्रकार मोहरूपी पवन की प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता फिरता था।

दोहा 82 के अंतर्गत
चौपाई

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥ फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥ १ ॥

अर्थ:

अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया।

चौपाई

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥ देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥ २ ॥

अर्थ:

फिर जब अपने प्रभु का अवधपुरी में जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ।

चौपाई

राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥ तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के पेट में मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान माया के स्वामी कृपालु भगवान् श्रीराम को देखा।

चौपाई

करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥ उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ी में देखा। मन में विशेष मोह होने से मैं भ्रमित हो गया।

दोहा

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥ ८२ (क) ॥

अर्थ:

मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुबीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँह से बाहर आ गया।

दोहा

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम॥ ८२ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों प्रकार से मन को समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था।

दोहा 83 के अंतर्गत
चौपाई

देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥ धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥ १ ॥

अर्थ:

यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेट के अंदर देखी हुई] उस प्रभुता का स्मरण कर मैं शरीर की सुध भूल गया और 'हे आर्तजनों के रक्षक! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए' पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती थी!।

चौपाई

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥ कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥ २ ॥

अर्थ:

तदनन्तर प्रभु ने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी माया की प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभु ने अपना कर-कमल मेरे सिर पर रखा। दीनदयालु ने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया।

चौपाई

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥ प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥ ३ ॥

अर्थ:

सेवकों को सुख देने वाले, कृपा के समूह (कृपामय) श्रीरामजी ने मुझे मोह से सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहले वाली प्रभुता को विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ।

चौपाई

भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥ सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभु की भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदय में बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनंद से] नेत्रों में जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकार से विनती की।

दोहा

सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास। बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास॥ ८३ (क) ॥

अर्थ:

मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दास को दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गंभीर और कोमल वचन बोले--।

दोहा

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि। अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥ ८३ (ख) ॥

अर्थ:

हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमादिक सिद्धियाँ, अपर ऋद्धियाँ तथा मोक्ष, सकल सुखों की खानि।

दोहा 84 के अंतर्गत
चौपाई

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥ आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत् में मुनियों के लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संशय नहीं। जो तेरे मन में भावे, सो माँग ले।

चौपाई

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेउँ॥ प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेम में भर गया। तब मन में अनुमान करने लगा कि प्रभु ने सब सुखों के देने की बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।

चौपाई

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥ भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥ ३ ॥

अर्थ:

भक्ति से रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमक के बिना बहुत प्रकार के भोजन के पदार्थ। भजन से रहित सुख किस काम के? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला--।

चौपाई

जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥ मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदय के भीतर की जानने वाले हैं।

दोहा

अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव। जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥ ८४ (क) ॥

अर्थ:

आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य, निष्काम) भक्ति को श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है,।

दोहा

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥ ८४ (ख) ॥

अर्थ:

हे भक्तों के [मन-इच्छित फल देने वाले] कल्पवृक्ष! हे शरणागत के हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये।

दोहा 85 के अंतर्गत
चौपाई

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥ सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥ १ ॥

अर्थ:

“एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंश के स्वामी परम सुख देने वाले वचन बोले--हे काक! सुन, तू स्वभाव से ही बुद्धिमान है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता?।

चौपाई

सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥ जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत् में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योग की अग्नि में तन जलाते रहते हैं, करोड़ों जतन करके भी जिसको (जिस भक्तिको) नहीं पाते।

चौपाई

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥ सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपा से अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे।

चौपाई

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥ जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥ ४ ॥

अर्थ:

भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग--इन सबके भेद को तू मेरी कृपा से ही जान जायगा। तुझे साधन का कष्ट नहीं होगा।

दोहा

माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ (क) ॥

अर्थ:

माया से उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अज, अगुण (प्रकृति के गुणों से रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणों की खान ब्रह्म जानना।

दोहा

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥ ८५ (ख) ॥

अर्थ:

हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम करना।

दोहा 86 के अंतर्गत
चौपाई

अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी॥ निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥ १ ॥

अर्थ:

अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादि के द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। मैं तुझको यह 'निज सिद्धान्त' सुनाता हूँ। सुनकर मन में धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर।

चौपाई

मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥ सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥ २ ॥

अर्थ:

यह सारा संसार मेरी माया से उत्पन्न है। [इसमें] अनेक प्रकार के चराचर जीव हैं। वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। [किन्तु] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छे लगते हैं।

चौपाई

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥ तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥ ३ ॥

अर्थ:

उन मनुष्यों में भी द्विज, द्विजों में भी वेदों को [कण्ठ में] धारण करने वाले, उनमें भी वेदोक्त धर्म पर चलने वाले, उनमें भी विरक्त (वैराग्यवान्) मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानों में फिर ज्ञानी और ज्ञानियों से भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं।

चौपाई

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥ पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

विज्ञानियों से भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य ('निज सिद्धान्त') कहता हूँ कि मुझे अपने सेवक के समान प्रिय कोई भी नहीं है।

चौपाई

भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥ भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥ ५ ॥

अर्थ:

भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवों के समान ही प्रिय है। परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणों के समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है।

दोहा

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग। श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥ ८६ ॥

अर्थ:

पवित्र, सुशील और सुमति-प्रिय सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं। हे काक! सावधान होकर सुन।

दोहा 87 के अंतर्गत
चौपाई

एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥ कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥ १ ॥

अर्थ:

एक पिता के बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी।

चौपाई

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥ २ ॥

अर्थ:

कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभी पर समान होता है। परन्तु इनमें से यदि कोई मन, वचन और कर्म से पिताका ही भक्त होता है, स्वप्न में भी दूसरा धर्म नहीं जानता।

चौपाई

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥ एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥ ३ ॥

अर्थ:

वह पुत्र पिताको प्राणों के समान प्रिय होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकार से अज्ञानी (मूर्ख) ही हो। इस प्रकार त्रिजग के देव, मनुष्य और असुरों समेत जितने भी चराचर जीव हैं,

चौपाई

अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥ तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥ ४ ॥

अर्थ:

[उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सब पर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमें से जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीर से मुझको भजता है,

दोहा

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥ ८७ (क) ॥

अर्थ:

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्व भाव से मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है।

सोरठा

सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥ ८७ (ख) ॥

अर्थ:

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणों के समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझे भज।

दोहा 88 के अंतर्गत
चौपाई

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥ प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥ १ ॥

अर्थ:

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरंतर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभु के वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मन अत्यन्त हर्षित होता था।

चौपाई

सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥ प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥ २ ॥

अर्थ:

वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभ से उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभु की शोभा का वह सुख नेत्र ही जानते हैं। कह कैसे सकते हैं? उनके पास वाणी तो है ही नहीं।

चौपाई

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥ सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझे बहुत प्रकार से भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। नेत्रों में जल भरकर और मुख को कुछ रूखा [-सा] बनाकर उन्होंने माता की ओर देखा— [और मुखाकृति तथा चितवन से माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है।

चौपाई

देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥ गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥ ४ ॥

अर्थ:

यह देखकर माता तुरंत उठकर दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजी को छाती से लगा लिया। वे गोद में लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी की ललित लीलाएँ गाने लगीं।

सोरठा

जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥ ८८ (क) ॥

अर्थ:

जिस सुख के लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजी ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं।

सोरठा

सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ। ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति॥ ८८ (ख) ॥

अर्थ:

उस सुख का लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्न में भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुख को भी कुछ नहीं गिनते।

दोहा 89 के अंतर्गत
चौपाई

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥ राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥ १ ॥

अर्थ:

मैं और कुछ समय तक अवधपुरी में रहा और मैंने श्रीरामजी की रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजी की कृपा से मैंने भक्ति का वर पाया। तत्पश्चात् प्रभु के चरणों की वन्दना करके मैं अपने आश्रम पर लौट आया।

चौपाई

तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥ यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजी ने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरि की मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा।

चौपाई

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥ राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्‌ के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिए, श्रीरामजी की कृपा बिना श्रीरामजी की प्रभुता नहीं जानी जाती।

चौपाई

जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जल की चिकनाई ठहरती नहीं।

सोरठा

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु। गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥ ८९ (क) ॥

अर्थ:

गुरु के बिना क्या ज्ञान होता है? ज्ञान के बिना क्या वैराग्य होता है? वेद और पुराण गाते हैं कि हरि-भक्ति के बिना क्या सुख मिल सकता है?

सोरठा

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलैकि जल बिनु नावकोटि जतन पचिपचि मरिअ॥ ८९ (ख) ॥

अर्थ:

हे तात! स्वाभाविक संतोष के बिना क्या कोई विश्राम पा सकता है? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या जल के बिना नाव चल सकती है?

दोहा 90 के अंतर्गत
चौपाई

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥ १ ॥

अर्थ:

संतोष के बिना कामनाओं का नाश नहीं होता और कामनाएँ रहते हुए स्वप्न में भी सुख नहीं होता। श्रीराम के भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरती के भी कहीं पेड़ उग सकता है?

चौपाई

बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥ २ ॥

अर्थ:

विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाश के बिना क्या कोई अवकाश पा सकता है? श्रद्धा के बिना धर्म नहीं होता। क्या पृथ्वी के बिना कोई गन्ध पा सकता है?

चौपाई

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥ सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई॥ ३ ॥

अर्थ:

तप के बिना क्या तेज फैल सकता है? जल के बिना संसार में क्या रस हो सकता है? पण्डितजनों की सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाईं! जैसे बिना तेज (अग्नि-तत्त्व) के रूप नहीं मिलता।

चौपाई

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥ ४ ॥

अर्थ:

निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना मन क्या स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्व के बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरि के भजन बिना भव-भय का नाश नहीं होता।

दोहा

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ ९० (क) ॥

अर्थ:

बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना श्रीरामजी पिघलते नहीं और श्रीरामजी की कृपा के बिना जीव स्वप्न में भी शान्ति नहीं पाता।

सोरठा

अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ ९० (ख) ॥

अर्थ:

ऐसा विचार कर, हे धीरबुद्धि! सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहों को छोड़कर करुणाकर, सुन्दर और सुखदायक श्रीरघुवीर का भजन कीजिये।

दोहा 91 के अंतर्गत
चौपाई

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥ कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥ १ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभु के प्रताप और महिमा का गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्ति से बढ़ाकर नहीं कही है। यह सब अपनी आँखों देखी कही है।

चौपाई

महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा॥ निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी की महिमा, नाम, रूप और गुणों की कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं। मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीहरि के गुण गाते हैं। निगम, शेष और शिव भी उनका पार नहीं पाते।

चौपाई

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

आपसे लेकर मच्छर पर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाश में उड़ते हैं, किन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात! श्रीरघुनाथजी की महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है ?

चौपाई

रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥ सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का अरबों कामदेवों के समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओं के समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रों के समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशों के समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है।

दोहा

मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास। ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥ ९१ (क) ॥

अर्थ:

अरबों पवन के समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्यों के समान प्रकाश है। अरबों चन्द्रमाओं के समान वे शीतल और संसार के समस्त भयों का नाश करनेवाले हैं।

दोहा

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥ ९१ (ख) ॥

अर्थ:

अरबों कालों के समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं। वे भगवान् अरबों धूमकेतुओं (पुच्छल तारों) के समान अत्यन्त प्रबल हैं।

दोहा 92 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥ तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥ १ ॥

अर्थ:

अरबों पातालों के समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजों के समान भयानक हैं। अनन्त कोटि तीर्थों के समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पाप-समूह का नाश करनेवाला है।

चौपाई

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥ कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयों के समान अचल (स्थिर) हैं और अरबों समुद्रों के समान गहरे हैं। भगवान् अरबों कामधेनुओं के समान सब कामनाओं (इच्छित पदार्थों) के देनेवाले हैं।

चौपाई

सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥ बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥ ३ ॥

अर्थ:

उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियों के समान चतुराई है। अरबों ब्रह्माओं के समान सृष्टि रचना की निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओं के समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रों के समान संहार करनेवाले हैं।

चौपाई

धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥ भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

वे अरबों कुबेरों के समान धनवान् और करोड़ों मायाओं के समान सृष्टि के खजाने हैं। बोझ उठाने में वे अरबों शेषों के समान हैं। [अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातों में] सीमारहित और उपमारहित हैं।

छन्द

निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥ एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

अर्थ:

श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीराम के समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओं के समान कहने से सूर्य [प्रशंसा को नहीं वरन्] अत्यन्त लघुता को ही प्राप्त होता है (सूर्य की निंदा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धि के विकास के अनुसार मुनीश्वर श्रीहरि का वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तों के भावमात्र को ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णन को प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं॥।

दोहा

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ। संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ ९२ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया।

सोरठा

भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन॥ ९२ (ख) ॥

अर्थ:

सुख के भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मान को छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजी का ही भजन करना चाहिये।

दोहा 93 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥ नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥ १ ॥

अर्थ:

भुशुण्डिजी के सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराज ने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रों में [प्रेमानन्द के आँसुओं का] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजी का प्रताप हृदय में धारण किया।

चौपाई

पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना॥ पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा॥ २ ॥

अर्थ:

वे अपने पिछले मोह को समझकर (याद करके) पछताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्म को मनुष्य करके माना। गरुड़जी ने बार-बार काकभुशुण्डिजी के चरणों पर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजी के ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया।

चौपाई

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥ ३ ॥

अर्थ:

गुरु के बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजी के समान ही क्यों न हो। [गरुड़जी ने कहा--] हे तात! मुझे संदेह-रूपी सर्प ने ग्रस लिया था और [साँप के डसने पर जैसे विष चढ़ने से लहरें आती हैं, वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरें आ रही थीं।

चौपाई

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥ तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना॥ ४ ॥

अर्थ:

आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी (साँप का विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तों को सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजी ने मुझे जिला लिया। आपकी कृपा से मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजी का अनुपम रहस्य जाना।

दोहा

ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाइ कर जोरि। बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि॥ ९३ (क) ॥

अर्थ:

उनकी (भुशुण्डिजी की) बहुत प्रकार से प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले--।

दोहा

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि। कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि॥ ९३ (ख) ॥

अर्थ:

हे प्रभो! हे स्वामी! मैं अपने अविवेक के कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपासिंधु! मुझे अपना “निज दास” जानकर आदरपूर्वक मेरे प्रश्न का उत्तर कहिये।

दोहा 94 के अंतर्गत
चौपाई

तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥ ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥ १ ॥

अर्थ:

आप सबज्ञ, तत्त्वज्ञ, तम से पार हैं; उत्तम बुद्धि, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान के निवास हैं, और श्रीरघुनाथजी के प्रिय दास हैं।

चौपाई

कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥ राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥ २ ॥

अर्थ:

आपने यह देह किस कारण से पाई ? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी ! हे आकाशगामी ! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये।

चौपाई

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥ मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मैंने शिवजी से ऐसा सुना है कि महाप्रलय में भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मन में सन्देह है।

चौपाई

अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥ अंड कटाह अमित लयकारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

[क्योंकि] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् काल का कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डों का नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है।

सोरठा

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥ ९४ (क) ॥

अर्थ:

[ऐसा वह] अत्यन्त भयंकर काल आपको नहीं व्यापता (आप पर प्रभाव नहीं दिखलाता) इसका क्या कारण है ? हे कृपालु ! मुझे कहिये, यह ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल है ?

दोहा

प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग। कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग॥ ९४ (ख) ॥

अर्थ:

हे प्रभो! आपके आश्रम में आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया। इसका क्या कारण है? हे नाथ! यह सब प्रेमसहित कहिये।

दोहा 95 के अंतर्गत
चौपाई

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥ धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे उमा! गरुड़जी की वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेम से बोले--हे सर्पों के शत्रु! आपकी बुद्धि धन्य है! धन्य है! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे।

चौपाई

सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई॥ सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥ २ ॥

अर्थ:

आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मों की याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तार से कहता हूँ। हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये।

चौपाई

जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥ सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मन को रोकना), दम (इन्द्रियों को रोकना), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सब का फल श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रेम होना है। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता।

चौपाई

एहिं तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥ जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥ ४ ॥

अर्थ:

मैंने इसी शरीर से श्रीरामजी की भक्ति प्राप्त की है। इसी से इस पर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उस पर सभी कोई प्रेम करते हैं।

सोरठा

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं। अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ (क) ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! वेदों में मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीच से भी प्रेम करना चाहिये।

सोरठा

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम॥ ९५ (ख) ॥

अर्थ:

रेशम कीड़े से होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसी से उस परम अपवित्र कीड़े को भी सब कोई प्राणों के समान पालते हैं।

दोहा 96 के अंतर्गत
चौपाई

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥ सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥ १ ॥

अर्थ:

जीव के लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर श्रीरघुबीर का भजन किया जाय।

चौपाई

राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥ राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥ २ ॥

अर्थ:

जो श्रीरामजी के विमुख है वह यदि ब्रह्माजी के समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीर से मेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसी से हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है।

चौपाई

तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥ प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरा मरण अपनी इच्छा पर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदों ने वर्णन किया है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता। पहले मोह ने मेरी बहुत दुर्दशा की। श्रीरामजी के विमुख होकर मैं कभी सुख से नहीं सोया।

चौपाई

नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥ कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

अनेकों जन्मों में मैंने अनेकों प्रकार के योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किये। हे गरुड़जी! जगत में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [बार-बार] घूम-फिरकर जन्म न लिया हो।

चौपाई

देखेउँ करि सब करम गोसाईं। सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं॥ सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥ ५ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब (इस जन्म) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। हे नाथ! मुझे बहुत-से जन्मों की याद है। [क्योंकि] श्रीशिवजी की कृपा से मेरी बुद्धि को मोह ने नहीं घेरा।