ललित अंक कुलिसादिक चारी
ललित अंक कुलिसादिक चारी
चौपाई ४, दोहा ७६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥ चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई॥ ४ ॥
अर्थ
[तलवे में] वज्रादि (वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणों में मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नों से जड़ी हुई सोने की बनी हुई सुन्दर करधनी का शब्द सुहावना लग रहा है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा