यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा

चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥ १ ॥

अर्थ

हे कृपालु! बताइये, उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया? और हे कामदेव के शत्रु! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा