निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान
दोहा ७३ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख) ॥
अर्थ
निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ है, परन्तु सगुण रूप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान् के अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रों को सुनकर मुनियों के भी मन को भ्रम हो जाता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ७३ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा