बिनु संतोष न काम नसाहीं
बिनु संतोष न काम नसाहीं
चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा॥ १ ॥
अर्थ
संतोष के बिना कामनाओं का नाश नहीं होता और कामनाएँ रहते हुए स्वप्न में भी सुख नहीं होता। श्रीराम के भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरती के भी कहीं पेड़ उग सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा