सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई
चौपाई २, दोहा ९५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई॥ सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥ २ ॥
अर्थ
आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मों की याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तार से कहता हूँ। हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा