देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब
दोहा ८२ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥ ८२ (क) ॥
अर्थ
मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुबीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँह से बाहर आ गया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ८२ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा