तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई

चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥ माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥ १ ॥

अर्थ

उस सुन्दर पर्वत पर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक,

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा