रामु काम सत कोटि सुभग तन

चौपाई ४, दोहा ९१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन॥ सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा॥ ४ ॥

अर्थ

श्रीरामजी का अरबों कामदेवों के समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओं के समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्रों के समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशों के समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा