नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा
दोहा ५२ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ (ख) ॥
अर्थ
हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीर की कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटों से उसे पीकर तृप्त नहीं होता।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ५२ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा