पीपर तरु तर ध्यान सो धरई
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई
चौपाई ३, दोहा ५७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥ आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥ ३ ॥
अर्थ
वह पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान धरता है। पाकर के नीचे जपयज्ञ करता है। आम की छाया में मानसिक पूजा करता है। श्रीहरि के भजन को छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा