कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई
चौपाई २, दोहा ८७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥ २ ॥
अर्थ
कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभी पर समान होता है। परन्तु इनमें से यदि कोई मन, वचन और कर्म से पिताका ही भक्त होता है, स्वप्न में भी दूसरा धर्म नहीं जानता।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा