ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा

चौपाई १, दोहा ७९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥ हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥ १ ॥

अर्थ

हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्रीहरि के भजन बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता। श्रीहरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती। प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा