राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ॥

दोहा ७८ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ॥ सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ (ख) ॥

अर्थ

सभी तारागणों के साथ सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं, उन सब में दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ७८ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा