तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता

चौपाई ३, दोहा ९१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥ तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥ ३ ॥

अर्थ

आपसे लेकर मच्छर पर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाश में उड़ते हैं, किन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात! श्रीरघुनाथजी की महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है ?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा