निरुपम न उपमा आन राम समान

छन्द, दोहा ९२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥ एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

अर्थ

श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीराम के समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओं के समान कहने से सूर्य [प्रशंसा को नहीं वरन्] अत्यन्त लघुता को ही प्राप्त होता है (सूर्य की निंदा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धि के विकास के अनुसार मुनीश्वर श्रीहरि का वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तों के भावमात्र को ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णन को प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं॥।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का छन्द, दोहा ९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा