मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही

चौपाई २, दोहा ६१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥ तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥ २ ॥

अर्थ

हे गरुड़! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब सन्देहों का तो तभी नाश हो जब दीर्घ काल तक सत्संग किया जाय।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा