निज अनुभव अब कहउँ खगेसा

चौपाई ३, दोहा ८९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥ राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥ ३ ॥

अर्थ

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्‌ के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिए, श्रीरामजी की कृपा बिना श्रीरामजी की प्रभुता नहीं जानी जाती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा