सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु

दोहा ६३ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥ ६३ (ख) ॥

अर्थ

पक्षिराज गरुड़जी ने कोमल वचन कहे--आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी स्तुति स्वयं महादेवजी ने आदरपूर्वक अपने श्रीमुख से की है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ६३ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा