उत्तरकाण्ड
उत्तरकाण्ड में अयोध्या में विजयी वापसी, राम का राज्याभिषेक, रामराज्य की स्थापना और गहन आध्यात्मिक शिक्षाओं का वर्णन है।
मुख्य प्रसंग: अयोध्या वापसी · राम राज्य · आध्यात्मिक शिक्षा
काण्ड ७ · २१ प्रकरण
छंद संख्या
उत्तरकाण्ड के प्रकरण
मंगलाचरण
उत्तरकाण्ड का आरंभ मंगलमय वंदना से होता है, जिसमें प्रभु, गुरु और संतों की स्तुति कर कथा के लिए पवित्र भावभूमि बनाई जाती है।
भरत विरह तथा भरत-हनुमान मिलन, अयोध्या में आनंद
श्रीरामजी के वियोग में भरतजी अत्यंत व्याकुल हैं। हनुमानजी शुभ समाचार लेकर आते हैं, और उनके वचनों से अयोध्या आनंद से भर उठती है।
श्रीरामजी का स्वागत, भरत मिलाप, सबका मिलनानंद
अयोध्या में श्रीरामजी का भव्य स्वागत होता है और भरतजी से उनका करुणामय मिलन सभी को भावविह्वल कर देता है। भाइयों, माताओं और नगरवासियों का हृदय प्रेम और आनंद से भर जाता है।
राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
श्रीरामजी का दिव्य राज्याभिषेक संपन्न होता है। इस पावन अवसर पर वेद और शिवजी प्रभु की महिमा का गान करते हैं।
वानरों की और निषाद की विदाई
श्रीरामजी प्रेम, आदर और उपहारों सहित अपने सहायकों को विदा करते हैं। वानर और निषाद प्रभु से बिछुड़ते समय गहन स्नेह और कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
रामराज्य का वर्णन
रामराज्य में धर्म, न्याय, करुणा और समृद्धि का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। प्रजा सुखी है, प्रकृति संतुलित है, और जीवन में शांति का प्रकाश व्याप्त है।
पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादि का आगमन और संवाद
चारों भाइयों के घर पुत्रों का जन्म होता है और अयोध्याजी की शोभा और भी बढ़ जाती है। इसी बीच सनकादि मुनि पधारते हैं और प्रभु से परम तत्त्व पर पावन संवाद होता है।
हनुमानजी द्वारा भरतजी का प्रश्न और श्रीरामजी का उपदेश
भरतजी हनुमानजी के माध्यम से अपने विनम्र प्रश्न प्रभु के समक्ष रखते हैं। श्रीरामजी उनके उत्तर में धर्म, भक्ति और जीवन के मर्म का उपदेश देते हैं।
श्रीरामजी का प्रजा को उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियों की कृतज्ञता
श्रीरामजी प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति से युक्त जीवन का उपदेश देते हैं, जिसे श्रीरामगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। पुरवासी श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ प्रभु के वचनों को स्वीकार करते हैं।
श्रीराम-वसिष्ठ संवाद, श्रीरामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना
गुरु वसिष्ठ और श्रीरामजी के बीच गूढ़ आध्यात्मिक संवाद होता है। इसके बाद प्रभु अपने भाइयों सहित अमराई में जाते हैं और सहज प्रेममय वातावरण प्रकट होता है।
नारदजी का आना और स्तुति करके ब्रह्मलोक को लौट जाना
देवर्षि नारद प्रभु के दर्शन करके उनकी महिमा का गान करते हैं। स्तुति पूर्ण कर वे ब्रह्मलोक को लौट जाते हैं।
शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ मोह, गरुड़जी का काकभुशुण्डि से रामकथा और राम महिमा सुनना
शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से गरुड़जी के मोह का कारण प्रकट होता है। फिर गरुड़जी काकभुशुण्डि से श्रीरामकथा और प्रभु की अनंत महिमा का अमृतमय श्रवण करते हैं।
काकभुशुण्डि की अपनी पूर्वजन्मकथा और कलि महिमा कहना
काकभुशुण्डि अपने पूर्व जन्मों का वृत्तांत सुनाते हैं और कलियुग के स्वभाव का गंभीर विवेचन करते हैं। वे बताते हैं कि ऐसे समय में भक्ति ही सबसे सरल और सुरक्षित आश्रय है।
गुरुजी का अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत
काकभुशुण्डि अपने पूर्व जन्म की वह घटना सुनाते हैं जिसमें गुरु का अनादर होने पर शिवजी का शाप प्राप्त हुआ। यही कठोर मोड़ आगे चलकर दिव्य कृपा का कारण बनता है।
रुद्राष्टक
यह भगवान शिव की अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तुति है। इसके पदों में शिवतत्त्व की महिमा, निराकारता और करुणा का अनुपम वर्णन मिलता है।
गुरुजी का शिवजी से अपराध क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डि की आगे की कथा
गुरुजी शिवजी से शिष्य के अपराध की क्षमा याचना करते हैं, और शाप अंततः अनुग्रह में परिणत होता है। इसके बाद काकभुशुण्डि अपनी आध्यात्मिक यात्रा की आगे की कथा कहते हैं।
काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
काकभुशुण्डिजी लोमशजी के पास जाते हैं, जहाँ उन्हें शाप भी मिलता है और अनुग्रह भी। यही अनुभव उनकी भक्ति को और अधिक दृढ़ और अखंड बनाता है।
ज्ञान और भक्ति का निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्ति की महान महिमा
यहाँ ज्ञान और भक्ति के स्वरूप का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। ज्ञानदीपक का प्रतीक लेकर बताया गया है कि अंततः भक्ति ही साधक को सहजता से प्रभु तक पहुँचाती है।
गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर
गरुड़जी जीवन, धर्म और साधना से जुड़े सात महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं। काकभुशुण्डि उनके उत्तरों में आध्यात्मिक मार्ग का सार प्रकट करते हैं।
भजन महिमा
प्रभु के नाम, स्मरण और भजन की महिमा का अत्यंत सरस वर्णन मिलता है। बताया गया है कि सच्चे प्रेम से किया गया भजन जीव को भवसागर से पार लगाने वाला है।
रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति
यहाँ रामायण की महिमा कही गई है, फिर तुलसीदासजी अत्यंत विनयपूर्वक अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं। अंत में इसके श्रवण और पाठ से प्राप्त होने वाले पुण्य एवं कल्याण का वर्णन है।