तेहिं मम पद सादर सिरु नावा

चौपाई १, दोहा ६१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥ सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥ १ ॥

अर्थ

गरुड़ ने आदरपूर्वक मेरे चरणों में सिर नवाया और फिर मुझ को अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेम सहित उनसे कहा--।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा