कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा

चौपाई ३, दोहा ८३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥ प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥ ३ ॥

अर्थ

सेवकों को सुख देने वाले, कृपा के समूह (कृपामय) श्रीरामजी ने मुझे मोह से सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहले वाली प्रभुता को विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा