तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल
सोरठा ९४ (क) · उत्तरकाण्ड
सोरठा पाठ
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥ ९४ (क) ॥
अर्थ
[ऐसा वह] अत्यन्त भयंकर काल आपको नहीं व्यापता (आप पर प्रभाव नहीं दिखलाता) इसका क्या कारण है ? हे कृपालु ! मुझे कहिये, यह ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल है ?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का सोरठा ९४ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा