महामोह उपजा उर तोरें
महामोह उपजा उर तोरें
चौपाई ४, दोहा ५९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥ चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥ ४ ॥
अर्थ
हे गरुड़! आपके हृदय में बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझाने से तुरंत नहीं मिटेगा। अतः हे पक्षिराज! आप ब्रह्माजी के पास जाइये और वहाँ जिस काम के लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा