प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी
चौपाई ४, दोहा ७२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
प्रकृति से परे, प्रभु सबके हृदय में बसने वाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ मोह का कारण ही नहीं है। क्या अन्धकार कभी सूर्य के सामने जा सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा