कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं

चौपाई ५, दोहा ६२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥ प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥ ५ ॥

अर्थ

फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षी की ही बोली समझते हैं। हे भवानी ! प्रभु की माया [बड़ी ही] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले ?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा