कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज

सोरठा ८९ (ख) · उत्तरकाण्ड

सोरठा पाठ

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलैकि जल बिनु नावकोटि जतन पचिपचि मरिअ॥ ८९ (ख) ॥

अर्थ

हे तात! स्वाभाविक संतोष के बिना क्या कोई विश्राम पा सकता है? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या जल के बिना नाव चल सकती है?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का सोरठा ८९ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा