देखि चरित यह सो प्रभुताई
देखि चरित यह सो प्रभुताई
चौपाई १, दोहा ८३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥ धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥ १ ॥
अर्थ
यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेट के अंदर देखी हुई] उस प्रभुता का स्मरण कर मैं शरीर की सुध भूल गया और 'हे आर्तजनों के रक्षक! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए' पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती थी!।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा