जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष
सोरठा ८८ (क) · उत्तरकाण्ड
सोरठा पाठ
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥ ८८ (क) ॥
अर्थ
जिस सुख के लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजी ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का सोरठा ८८ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा