काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त
दोहा ७३ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥ ७३ (क) ॥
अर्थ
जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःखरूप घर में आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकार-रूपी कुएँ में पड़े हुए हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ७३ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा