उपजइ राम चरन बिस्वासा

चौपाई ५, दोहा ५५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा॥ ५ ॥

अर्थ

तथा श्रीरामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाता है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा