बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु
दोहा ९० (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ ९० (क) ॥
अर्थ
बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना श्रीरामजी पिघलते नहीं और श्रीरामजी की कृपा के बिना जीव स्वप्न में भी शान्ति नहीं पाता।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ९० (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा