सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति
दोहा ७९ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि। गयउँतहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि॥ ७९ (ख) ॥
अर्थ
सातों आवरणों को भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी, वहाँ तक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभु की भुजा को [अपने पीछे] देखकर मैं व्याकुल हो गया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ७९ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा