नील कंज लोचन भव मोचन

चौपाई ३, दोहा ७७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥ ३ ॥

अर्थ

नीले कमल के समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक सुशोभित है। भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशों की छवि छा रही है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा