निज सुख बिनु मन होइ कि

चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥ ४ ॥

अर्थ

निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना मन क्या स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्व के बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरि के भजन बिना भव-भय का नाश नहीं होता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा