कलबल बचन अधर अरुनारे

चौपाई २, दोहा ७७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे॥ ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा॥ २ ॥

अर्थ

कलबल (तोतले) वचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी दो-दो दाँतियाँ हैं। सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखों को देनेवाली चन्द्रमा की किरणों के समान मधुर मुसकान है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा