ताते नास न होइ दास कर
ताते नास न होइ दास कर
चौपाई २, दोहा ७९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर॥ भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा॥ २ ॥
अर्थ
हे पक्षिश्रेष्ठ! इसीसे दास का नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। श्रीरामजी ने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा