एहिं तन राम भगति मैं पाई

चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

एहिं तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥ जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥ ४ ॥

अर्थ

मैंने इसी शरीर से श्रीरामजी की भक्ति प्राप्त की है। इसी से इस पर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उस पर सभी कोई प्रेम करते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा