मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला
चौपाई १, दोहा ८९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥ राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥ १ ॥
अर्थ
मैं और कुछ समय तक अवधपुरी में रहा और मैंने श्रीरामजी की रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजी की कृपा से मैंने भक्ति का वर पाया। तत्पश्चात् प्रभु के चरणों की वन्दना करके मैं अपने आश्रम पर लौट आया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा