भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु

दोहा ८४ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥ ८४ (ख) ॥

अर्थ

हे भक्तों के [मन-इच्छित फल देने वाले] कल्पवृक्ष! हे शरणागत के हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ८४ (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा