माया संभव भ्रम सब अब न
माया संभव भ्रम सब अब न
दोहा ८५ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ (क) ॥
अर्थ
माया से उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अज, अगुण (प्रकृति के गुणों से रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणों की खान ब्रह्म जानना।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का दोहा ८५ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा