मन महुँ करइ बिचार बिधाता

चौपाई २, दोहा ६० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥ हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥ २ ॥

अर्थ

ब्रह्माजी मन में विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान् की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझ तक को अनेकों बार नचाया है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा