अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय
सोरठा ९० (ख) · उत्तरकाण्ड
सोरठा पाठ
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ ९० (ख) ॥
अर्थ
ऐसा विचार कर, हे धीरबुद्धि! सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहों को छोड़कर करुणाकर, सुन्दर और सुखदायक श्रीरघुवीर का भजन कीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का सोरठा ९० (ख) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा