बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई
चौपाई ३, दोहा ८८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥ सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥ ३ ॥
अर्थ
मुझे बहुत प्रकार से भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। नेत्रों में जल भरकर और मुख को कुछ रूखा [-सा] बनाकर उन्होंने माता की ओर देखा— [और मुखाकृति तथा चितवन से माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा