तब मैं भागि चलेउँ उरगारी
तब मैं भागि चलेउँ उरगारी
चौपाई ४, दोहा ७९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तब मैं भागि चलेउँ उरगारी। राम गहन कहँ भुजा पसारी॥ जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा॥ ४ ॥
अर्थ
हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! तब मैं भाग चला। श्रीरामजी ने मुझे पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरि की भुजा को अपने पास देखता था।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा