बिनु बिग्यान कि समता आवइ
बिनु बिग्यान कि समता आवइ
चौपाई २, दोहा ९० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥ २ ॥
अर्थ
विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाश के बिना क्या कोई अवकाश पा सकता है? श्रद्धा के बिना धर्म नहीं होता। क्या पृथ्वी के बिना कोई गन्ध पा सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा