जो माया सब जगहि नचावा

चौपाई १, दोहा ७२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥ १ ॥

अर्थ

जो माया सारे जगत् को नचाती है और जिसका चरित किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की भ्रुकुटी के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा