नौकारूढ़ चलत जग देखा

चौपाई ३, दोहा ७३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोहबस आपुहि लेखा॥ बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥ ३ ॥

अर्थ

नौका पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत् को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपने को अचल समझता है। बालक घूमते हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपस में एक दूसरे को झूठा कहते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा