गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा
चौपाई १, दोहा ५२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥ राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥ १ ॥
अर्थ
[शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजी के चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा