गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति

सोरठा ६८ (क) · उत्तरकाण्ड

सोरठा पाठ

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक॥ ६८ (क) ॥

अर्थ

श्रीरघुनाथजी के सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रह से श्रीरामजी के चरणों में मेरा प्रेम हो गया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा” प्रकरण का सोरठा ६८ (क) है। इस प्रकरण में शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ के मोह और काकभुशुण्डि द्वारा रामकथा श्रवण का वर्णन है।

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गरुड़ मोह, काकभुशुण्डि की रामकथा